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Jain Acharyas

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1) केवली  २) श्रुत केवली 3) ११ अंग, १० पूर्व के पाठी 4) अंग पूर्व के धारी  5) एक अंग एवं पूर्व के धारी  6) प्रथम श्रुत स्कंध   7) द्वितीय श्रुत स्कंध  8) सिद्धांत, अध्यात्म ज्ञानयोग  9) न्याय एवं कर्मयोग  10) लोक, ज्योतिष, औषधि योग  11) चारित्र योग  12) मंत्र एवं भक्ति योग 13) कथानुयोग  

Vedak Samyaktva

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Mokshmarg Prakashak page# 333 onwards has good description of Samyaktva and its types. It is the ninth adhikaar. Below excerpt is about Kshayopsham/Vedak Samyaktva.

Harivansh Puran - Keechak Katha

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Excerpt from Harivanshpuran – Jinsenacharya/Pannalal Jain (page # 553)

Atmanubhav ki Vidhi

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आत्मानुभव की विधि (from अध्यात्म न्यायदीपिका)

Laghu Pratikraman Notes

Notes for Laghu Pratikraman 5 मिथ्यात्व - एकांत, संशय, विपरीत, अज्ञान, विनय  (तत्वार्थसूत्र pg. 510-511) 12 अव्रत - पांच इन्द्रिय और मन के विषय एवं ५ स्थावर और एक त्रस की हिंसा. इन १२ प्रकार के त्याग रूप भाव न होना (तत्वार्थसूत्र pg. 514) 15 योग - मनोयोग के ४, वचन के ४ और काय के ७  25 कषाय - क्रोध, मान, माया लोभ * ४ (अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संजुलन) + ९ नोकषाय  3 दंड - मन, वचन, काय की अशुभ प्रवृति - यह तीन दंड है | रत्नकरण्ड श्रावकाचार pg. 304) 3 शल्य - १. मिथ्यादर्शन शल्य २. माया शल्य ३. निदान शल्य (रत्नकरण्ड श्रावकाचार pg. 317 - 320, तत्वार्थसूत्र pg. 484) 3 गारव - 3 मूढ़ता - (सम्यक्तव की घातक) १. लोकमूढ़ता २. देवमूढ़ता ३. गुरुमूढ़ता  (रत्नकरण्ड श्रावकाचार pg. 37 - 48 , 234) 4 आर्तध्यान - १. अनिष्ट संयोगज २. इष्ट वियोगज ३. रोग जनित ४. निदान जनित  (रत्नकरण्ड श्रावकाचार pg. 345 - 353) 4 रौद्रध्यान - १. हिंसानन्द २. मृषानंद ३. स्तेयानंद ४. परिग्रहानंद (रत्नकरण्ड श्रावकाचार pg. 353 - 356) 4 विकथा - १. चोरकथा २. स्त्रीकथा ३. ...

Prathmopsham Samyaktva

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Prathmopsham Samyaktva (प्रथमोपशम सम्यक्त्व) from PanchLabdhi (page #58) from Karnanuyog Parichay (page #61)

Upsham

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What is Upsham? From MokshMarg Prakashak (page #333) What is Prashast Upsham (प्रशस्त उपशम)? From Gunsthan Vivechan (page #34): What is Aprashast Upsham (अप्रशस्त उपशम) ? From Gunsthan Vivechan (page #34):